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Wednesday, May 6, 2015

दिल-ए-ग़मज़दा को सताओगे क्या तुम



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दिल-ए-ग़मज़दा को सताओगे क्या तुम,
मुझे बार-बार आजमाओगे क्या तुम |

ये हम हैं कि अब तक परेशाँ हैं,
शब्-ए-हिज्राँ की ताब लाओगे क्या तुम |


बस इतनी सी इक बात मैं पूछता हूँ,
कभी मुझको अपना बनाओगे क्या तुम |


न छोड़ोगे मर कर भी दामन हमारा,
जो वादा किया था निभाओगे क्या तुम |


गम-ए-ज़िन्दगी, ज़िंदगी बन चुका है,
हंसा कर मुझे अब रुलाओगे क्या तुम |


‘हर्ष’ आज मुल्क-ए-अदम से चला है,
इस बार ज़िन्दगी संग आओगे क्या तुम |


© हर्ष महाजन