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Tuesday, August 30, 2016

नफरत है उस शहर से...जिस-जिस शहर तू गुजरा

शर्मसार

...

नफरत है उस शहर से...जिस-जिस शहर तू गुजरा,
तूफां में "दाना मांझी".....क्या-क्या कहर तू गुज़रा |

क्या-क्या दिया तुझे अब..इस ख़िल्क़त-ए-शहर ने,
काँधे पे ले मुहब्बत.............पी-पी ज़हर तू गुजरा |

है आफरीन ज़ज्बा..................चर्चे हैं हर शहर में,
ये ज़िन्दगी में उठती....जिस-जिस लहर तू गुजरा |

ये हादसा नहीं पर............अरमां का था कतल ये,
हर दिल खिजाँ लिए था जिस-जिस शहर तू गुजरा |

लिक्खी बहुत यूँ ग़ज़लें.......ज़हन की बस्तियों पर,
हर शख्स आज रोया......अब जिस बहर तू गुज़रा |


______हर्ष महाजन

( ख़िल्क़त-ए-शहर = शहर के लोग/ जन-समूह )

221 2122 221 2122
मुजारी मुसम्मन अखरब

Tuesday, August 23, 2016

कुछ नज़र ती-सरे तिल पे आता नहीं (सूफियाना )


एक सूफियाना कलाम
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कुछ नज़र ती-सरे तिल पे आता नहीं,
तू जहाँ से क्युं मुझको उठाता नहीं ।

कब्र तक ये सफ़र अब बहुत हो चला,
ऐ खुदा मुझको घर क्यूँ बुलाता नहीं |

तोड़कर तूने मुझको तराशा बहुत,
जोह-री बन कभी तू बताता नहीं |

जन्मों-जन्मों से संचित हुए जो करम,
बक्शे तूने बहुत पर जताता नहीं |

बंद रख के जुबां कैसे बोलूं मैं क्या,
दसवें दरवाजे तक कोई खाता नहीं |

इतना नज़दीक लगते हो पर ध्यान में,
चेह-रा सामने फिर क्यूँ आता नहीं |

मेरा भगवन भी तू मेरा मौला भी तू,
कर रहम मुझको कुछ भी सुहाता नहीं |

कितने हैं खुश-नसीबां जो दर पे तेरे,
अब मेरी भी अलख क्यूँ जगाता नहीं |

ये मुहब्बत शुरू तुझसे तुझ पे ख़तम,
तेरे दर से कोई खाली जाता नहीं |

हर्ष महाजन


बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम
212-212-212-212

Monday, August 22, 2016

राह में शख्स वो मुस्कराते रहे,

पुरानी डायरी से......एडिट

-----------------नज़्म--------------

राह में शख्स......... वो मुस्कराते रहे,
दूर तक हमको.......वो याद आते रहे ।

हम भी थे अजनबी,वो भी थे अजनबी
तनहा-तनहा सफ़र....हम निभाते रहे।

दूर तक थी दिलों में..खलिश सी बहुत,
जब सफ़र टूटा......आँखें मिलाते रहे ।

ऐसे अनजान ज़ख्मों में....पीड़ा बहुत,
सोचकर अब तलक,  सर खुजाते रहे ।

हम मिलेंगे उसी,  मोड़ पर  सोच कर,
इक शबो रोज़........दीया जलाते रहे ।

हमसफ़र इस सफर से था अनजान यूँ,
पर वो शख्स दिल में घर को बनाते रहे ।

हमने जब जब ज़हन से, था पटका उन्हें,
पर वो ख्वाबों में....जुल्फें सजाते रहे ।

जान कर' हमसफ़र रिश्ता अंजान से,
सोच ये 'हर्ष'........ आंसू बहाते रहे ।

-----------–हर्ष महाजन

. बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम
212-22-212-212

Sunday, August 21, 2016

खिजाँ आयी है किस्मत में बहारों का भी दम निकले

पुरानी डायरी से एक ग़ज़ल .....

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खिजाँ आयी है किस्मत में बहारों का भी दम निकले,
जहाँ ढूँढें हम अरमां को , वहां अरमां भी कम निकले |

हजारों गम हुए दिल में न मुझको राख ये कर दें ,
कहीं इन ज़र्द आँखों से नदी बन के न हम निकले |

तुम्हें लिख-लिख के ख़त अक्सर कभी हम भूल जाते थे,
पुराने ख़त दराजों से जो निकले आज, नम निकले |

किसी की जुस्तजू करके कि खुद को खो चुके हैं हम,
उधर से बेरुखी उनकी इधर दुनिया से हम निकले |

जगह छोड़ी है जख्मों ने कहाँ अब 'हर्ष' सीने में,
कहीं इन सुर्ख ज़ख्मों से न लावा बनके गम निकले |

_________हर्ष महाजन ©

1222 1222 1222 1222

Saturday, August 20, 2016

न जाने कैसा होता है बता बरसात का मौसम





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न जाने कैसा होता है बता बरसात का मौसम,
कभी गर्मी कभी उम्मस कहा बरसात का मौसम |

हुआ जाता हूँ घायल जब भी आऊँ उसके कूचे में,
यही होता है क्या मुझको बता बरसात का मौसम |

यूँ सावन के महीने में जुदा होकर चले जाना,
कहे ये आँख का पानी हुआ बरसात का मौसम |

कभी मैं टूटकर उस पर घटाओं सी कड़कता था,
तो अक्सर उसकी आखों में दिखा बरसात का मौसम |

जुदाई में यूँ तडपा हूँ कि दिल की आग कहती है,
घटाओ खूब बरसो, हो चला, बरसात का मौसम |

हर्ष महाजन

बहरे हज़ज़ मुसमन सालिम
1222-1222-1222-1222

Wednesday, August 17, 2016

खुदाया उसकी तकलीफें मेरी जागीर हो जाएँ


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खुदाया उसकी तकलीफें मेरी जागीर हो जाएँ,
ज़माने भर की खुशियाँ उसकी अब ताबीर हो जाएँ |

यूँ दर्दों में तडपना और आन्हें मेरे सीने में,
कहीं तब्दील हो आन्हें न अब शमशीर हो जाएँ |

खुदा की हर अदालत में उसे गर चाह मिल जाए,
वो देखे ख्वाब दुनिया के, सभी तस्वीर हो जाएँ |

न मंजिल है न वादा है न उसकें बिन मैं जिंदा हूँ,
कहीं ये आदतें उसकी न अब तकदीर हो जाएँ |

जुबां से चुप ये आँखें बंद उसके कानों पर फालिज,
शहर ज़ख्मों के, सीने में, न अब तामीर हो जाएँ |

यूँ किस्से अपने लिक्खे खूब उसने खुद सफीनों पर,
फकत चाहत थी उसकी वो सभी तहरीर हो जाएँ |

हर्ष महाजन


1222-1222-1222-1222

Thursday, August 4, 2016

यूँ ज़िन्दगी में खुशियों सी वो बात नहीं है

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यूँ ज़िन्दगी में खुशियों सी वो बात नहीं है,
बिछुड़ा है जरा साथ मगर मात नहीं है |

मैं शिकवों भरी शामो सहर देख रहा हूँ,
ये घाव उठा दिल पे है सौगात नहीं है |

चलने लगी है आखों में रुक-रुक के ये नदिया,
ये गम का दिया रंग है बरसात नहीं है |

क्यूँ काल से उम्मीद रखूँ कोई रहम की,
है कर्मों की ये बात कोई घात नहीं है |

कुछ लोग लुटाते हैं शबो रोज़ नसीहत,
मैं कर सकूं ये बात भी औकात नहीं है |

हर्ष महाजन

221 1221 1221 122