Follow by Email

Thursday, February 2, 2017

तनहा सी ज़िन्दगी में, वो बात ढूंढते हैं

एक पुरानी कृति एडिट के साथ....

...

तनहा सी ज़िन्दगी में, इक बात ढूंढते हैं,
कब चाँद डूबा अपना, वो रात ढूंढते हैं |

कुछ लफ़्ज़ों से हुआ है मेरा वजूद खारिज,
किरदार खेला कैसे वो बात ढूंढते हैं |

मैं हूँ परेशाँ इतना तुम भी तो कम नहीं हो,
फुर्सत से मिलके दोनों जज़्बात ढूंढते हैं |

हरदम रहा तू शामिल, बरबादियों में मेरी,
ये हादसा हुआ क्यूँ, हालात ढूंढते हैं |

ऐ नींद कर सफ़र तू ख़्वाबों की वादियों में,
फिर इश्क की डगर के स्वलात ढूंढते हैं |

हर्ष महाजन


***
बहरे मुजारी मुसम्मन अखरब (शिकस्ता )
221-2122 // 221-2122
*इन्साफ की डगर पे बच्चो दिखाओ चल के |
*सारे जहाँ से अच्छा हिन्दूसितां हमारा |
*गाड़ी बुला रही है सीटी बजा रही है |
*ये ज़िंदगी के मेले दुनियां में कम न होंगे |
*ओ दूर के मुसाफिर हमको भी साथ ले ले |
*गुज़रा हुआ ज़माना आता नहीं दुबारा |
*तकदीर का फ़साना जाकर किसे सुनाएँ |



Sunday, January 29, 2017

दिल को ऐसे ही सज़ा देता हूँ मैं

...

दिल को ऐसे ही सज़ा देता हूँ मैं,
खत सभी उनके जला देता हूँ मैं ।

गर ग़ज़ल अच्छी लगे उनको कभी,
जल्द कागज़ से हटा देता हूँ मैं ।

आग जब दिल से कभी बुझने लगे,
सूखे ज़ख्मों को हवा देता हूँ मैं ।

जाने क्यूँ उनको दुआ दी मैंने आज,
बात जिनकी खुद भुला देता हूँ मैं ।

आज फिर ख़ूने ज़िगर जलता है क्यूँ,
आग जब दिल की बुझा देता हूँ मैं ।

चाह गर अखबार में सुर्खी बनूँ,
हादसा हो अब दुआ देता हूँ मैं ।

-----------–हर्ष महाजन

बहर
2122 - 2122 - 212
बहरे रमल मुसद्दस महज़ूफ़

*आपके पहलू में आकर रो दिए
        *दिल के अरमां आंसुओं में बह गये
        *तुम न जाने किस जहाँ में खो गये |
       

Wednesday, January 11, 2017

कोई अश्कों से ये पूछे क्यूँ लरजें खूब पलकों पर


...


कोई अश्कों से ये पूछे क्यूँ लरजें खूब पलकों पर,
कहीं दिल को है गहरी चोट आये खुद न सड़कों पर |

कहीं कुछ वोट की खातिर कहीं कुछ नोट की खातिर,
कहीं मैखानों में बिकते हैं हलके लोग हलकों पर |

कहीं ऐसा न हो तस्वीर दिल में खुद बदल जाए,
न उठ जाए कहीं एतबार किस्मत की लकीरों पर |

कोई बरसात ऐसी हो जो पानी को ही मय कर दे,
शहर बन जाएगा जंगल लगेगी भीड़ नलकों पर |

अगर फरहाद कोई शहर का सरताज हो जाए,
न उजड़े कोई भी दिलभर करेंगे राज़ मुल्कों पर |


_____________हर्ष महाजन
बहर :-
1222 1222 1222 1222

Sunday, January 8, 2017

हर तरफ रस्में निभा मुजरिम सा क्यूँ दिखता हूँ मैं


...

हर तरफ रस्में निभा मुजरिम सा क्यूँ दिखता हूँ मैं,
जाने इतना कागजों पर दर्द क्यूँ लिखता हूँ मैं |
.
छू के भी देखी बुलंदी आसमां की थी कभी,
अब समंदर में यूँ दरिया बनके क्यूँ छिपता हूँ मैं |

इतनी उल्फत इतनी चाहत रिश्तों में दस्तूर भी,
है चमन इतना हसीं तो वीराँ क्यूँ दिखता हूँ मैं |

शख्स जिनकी रूह तक खौला किया मेरे लिए,
था शज़र तो शाख बन अब ऐसे क्यूँ झुकता हूँ मैं |

हर तरफ जब साजों पर चलती मुसलसल इक ग़ज़ल,
तो उतर कर हर्फों में ऐ ‘हर्ष’ क्यूँ बिकता हूँ मैं |

हर्ष महाजन


बहर ..
2122 2122 2122 212

Friday, January 6, 2017

बन के दरिया गर समंदर...आँखों से चला आया हो

...

बन के दरिया गर समंदर...आँखों से चला आया हो,
दिल को मुमकिन है किसी गम ने बहुत तड़पाया हो ।

अपने ही गुलशन की कलियां गैर जब लगने लगें
तो समझना ज़ख्म कोई दिल से आ टकराया हो ।

खुश्क आँखों में अगर अश्क़ों की आ जाए महक,
तो यकीनन माँ का साया ख्वाब में उभर आया हो ।

पतझड़ों में हैराँ मौसम कुछ शज़र क्यूँ खिल गये,
अश्क़ शायद इनके साये.....में कभी टपकाया हो ।

कोई किस्मत में नहीं.............ढूँढा बहुत संसार में,
ये भी था मुमकिन खुदा ने उसको खुद भटकाया हो ।

-----------------हर्ष महाजन

बहरे रमल मुसम्मन महजूफ
2122 2122 2122 212